Saturday, June 15, 2019

अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम या चमकी बुखार। Acute Encephalitis Syndrome

अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम(AES) या चमकी बुखार:

अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी AES शरीर के मुख्य नर्वस सिस्टम यानी तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और वह भी खासतौर पर बच्चों में। जापानी एन्सेफलाइटिस सहित एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) कई अलग-अलग वायरस, बैक्टीरिया, कवक, परजीवी, रासायनिक / विषाक्त पदार्थों आदि के कारण होता है। मानसून की अवधि जब मच्छरों की मात्रा बढ़ जाता है या गर्मियों में जब तापमान बढ़ जाता है, तथा जबकि अन्य वायरस के कारण एन्सेफलाइटिस विशेष रूप से एंटरो-वायरस पूरे वर्ष में होता है।




भारत में, उत्तर और पूर्वी भारत में AES का प्रकोप खाली पेट खाने वाले बच्चों को बिना लीची के फल खाने से जोड़ा गया है। Hypoglycin A एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला अमीनो है जो कि अनचाहे लीची में पाया जाता है जो गंभीर उल्टी (जमैका उल्टी बीमारी) का कारण बनता है, जबकि MCPG लीची के बीजों में पाया जाने वाला है जो रक्त शर्करा, उल्टी, परिवर्तित मानसिक अवस्था में अचानक गिरावट का कारण बनता है, जिससे सुस्ती, बेहोशी, कोमा और मृत्यु हो सकती है। ये विषाक्त पदार्थ अचानक तेज बुखार का कारण बनते हैं और युवा, गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने के लिए पर्याप्त गंभीर होते हैं।

अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के लक्षण:

१-शुरुआत तेज बुखार से होती है।
२-फिर शरीर में ऐंठन महसूस होती है।
३-इसके बाद शरीर के तंत्रिका संबंधी कार्यों में रुकावट आने लगती है।
४-मानसिक भटकाव महसूस होता है।



रोगज़नक़ों के कारण कारण एजेंटों की एक विस्तृत श्रृंखला और न्यूरोलॉजिकल हानि की तीव्र दर को ध्यान में रखते हुए, चिकित्सकों को निदान और उपचार के बीच एक छोटी खिड़की की अवधि की चुनौती का सामना करना पड़ता है। जेई एंडेमिक जोन में रहने वाले लोगों की स्वच्छता को शिक्षित और बेहतर बनाने के लिए कई सरकारी पहल की गई हैं। सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों ने एईएस प्रभावित आबादी को उचित पोषण प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है क्योंकि अधिकांश प्रभावित लोग समाज के निम्न आर्थिक स्तर के हैं।

अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम(AES) या चमकी बुखार से बचाव के उपाय:

हाइपोग्लाइसीमिया यानी लो-ब्लड शुगर है असली जड़:

अक्यूट इंसेफेलाइटिस को बीमारी नहीं बल्कि सिंड्रोम यानी परिलक्षण कहा जा रहा है, क्योंकि यह वायरस, बैक्टीरिया और कई दूसरे कारणों से हो सकता है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मानें तो अब तक हुई मौतों में से 80 फीसदी मौतों में हाइपोग्लाइसीमिया का शक है। शाम का खाना न खाने से रात को हाइपोग्लाइसीमिया या लो-ब्लड शुगर की समस्या हो जाती है, खासकर उन बच्चों के साथ जिनके लिवर और मसल्स में ग्लाइकोजन-ग्लूकोज की स्टोरेज बहुत कम होती है। इससे फैटी ऐसिड्स जो शरीर में एनर्जी पैदा करते हैं और ग्लूकोज बनाते हैं, का ऑक्सीकरण हो जाता है। 

लो ब्लड शुगर का यह है लीची कनेक्शन:

'द लैन्सेट' नाम की मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च की मानें तो लीची में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थ जिन्हें hypoglycin A और methylenecyclopropylglycine (MPCG) कहा जाता है , शरीर में फैटी ऐसिड मेटाबॉलिज़म बनने में रुकावट पैदा करते हैं। इसकी वजह से ही ब्लड-शुगर लो लेवल में चला जाता है और मस्तिष्क संबंधी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं और दौरे पड़ने लगते हैं। अगर रात का खाना न खाने की वजह से शरीर में पहले से ब्लड शुगर का लेवल कम हो और सुबह खाली पेट लीची खा ली जाए तो अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम AES का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। 

स्वास्थ्य विभाग की सलाह- खाली पेट लीची न खाएं बच्चे :

बताया जा रहा है कि गर्मी के मौसम में बिहार के मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके में गरीब परिवार के बच्चे जो पहले से कुपोषण का शिकार होते हैं वे रात का खाना नहीं खाते और सुबह का नाश्ता करने की बजाए खाली पेट बड़ी संख्या में लीची खा लेते हैं। इससे भी शरीर का ब्लड शुगर लेवल अचानक बहुत ज्यादा लो हो जाता है और बीमारी का खतरा रहता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने माता-पिता को सलाह दी है कि वे बच्चों को खाली पेट लीची बिलकुल न खिलाएं।



0 comments:

Post a Comment