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Monday, May 27, 2019

प्रवाल पंचामृत के गुणकारी फायदे। Benefits of Praval Panchamrit.

प्रवाल पंचामृत का प्रभाव किन बीमारियों में लाभदायक है?

प्रवाल पंचामृत रस आनाह (अफरा), गुल्म (Tumour), उदररोग (पेट के रोग), प्लीहा (Spleen), बद्धोदर (कब्ज), कास (खांसी), श्वास, मंदाग्नि, कफ-वात प्रकोप से होने वाले रोग, ह्रदय रोग, ग्रहणी, अतिसार, प्रमेह, सब प्रकार के मूत्ररोग, मूत्रकृच्छ (मूत्र में जलन),अश्मरी (पथरी) इन सबको दूर करता है।
यह बाजार में अनेक उत्पादकों का उपलब्ध है।



प्रवाल पंचामृत का कार्य विशेष: 

मध्यम कोष्ट (Stomach), यकृत (Lever), प्लीहा(Spleen) और ग्रहणी (Duodenum) पर अच्छा होता है। पाचक पित्त में द्रवत्व धर्म बढ़ने पर अन्न पचन होने का धर्म कम हो जाता है। फिर अन्न-विदाह (अन्न पचने की जगह जलने लगता है) और अपचन होने लगता है। इस कारण से कभी-कभी उदर (पेट) में अफरा भी आता है। बार-बार दूषित खट्टी डकार, भोजन करने के कुच्छ समय बाद पेट में भारीपन,पेट खींचना, पेट पर पत्थर बांधने समान जड़ता, शूल या वेदना बहुधा ना हो, बेचैनी, मध्यम कोष्ट (Stomach) में आहार जैसा का वैसा पड़ रहा हो ऐसा भासना आदि लक्षण होने पर प्रवाल पंचामृत रस नींबू के रस के साथ देना चाहिये। पुराने विकार में मात्रा कम देनी चाहिये और लंबे समय तक देना चाहिये। कंठ में दाह (छाती में जलन), खट्टी डकार आदि पित्त के अम्लता के लक्षण अधिक हो, तो अनार के रस या दाडिमावलेह के साथ देना चाहिये।

इसी तरह अनाह (मलावरोध) के हेतु से मध्यम कोष्ट में वातगुल्म (वायु की गांठ) समान अफरा आता है। यह वायु बृहदंत्र (Large Intestine) में संगृहीत होती है। इस पर प्रवाल पंचामृत रस का अच्छा उपयोग होता है।

पित्त-गुल्म के प्रारंभ में थोडा बुखार, प्यास, मुखमंडल और समस्त शरीर लाल हो जाना,भोजन करने के दो घंटे बाद भयंकर पेट दर्द, पसीना आना, अन्न के विदाह (जलन) के हेतु से छाती में जलन, पेट में दर्द वाले स्थान पर स्पर्श भी सहन न होना आदि लक्षण पित्त-गुल्म के लक्षण है। यह सब लक्षण होने पर प्रवाल पंचामृत रस आंवले के क्वाथ के साथ देने से उत्तम उपयोग होता है।

उदर (पेट) रोग में यकृत वृद्धि (Lever Enlargement) कारण हो, और पित्तप्रधान लक्षण जैसे के – आंख, त्वचा, नाखून और मूत्र में पीलापन; मुख, हाथ और पैर पर थोड़ी सूजन,पेट में वायु भरा रहना, पेट में थोडा पानी भरा रहना, बार-बार घबराहट, प्यास, मूत्र थोडा और अति पीला या लाल रंग का हो जाना, मल कच्चा, सफेद और दुर्गंधयुक्त हो जाना,मलशुद्धि योग्य न होना, कभी कभी छाती में जलन और घबराहट होकर उल्टी होना आदि लक्षण मुख्य होने पर प्रवाल पंचामृत रस का उपयोग अति हितावह है। अनुपान रूप से ताजा दही का पानी देने से पित्तप्रकोप जल्दी शमन होता है।

कास (खांसी) और श्वास रोग में अति घबराहट, अन्न का विदाह (अन्न पेट में जल जाता है),बेचैनी, ठंडे पदार्थ और ठंडी हवा की इच्छा, ठंडे पदार्थ और ठंडी हवा अच्छी लगना, दूध,अनार दाने आदि पित्तशामक वस्तु अच्छी लगना आदि लक्षण होने पर प्रवाल पंचामृत रस का उपयोग करना चाहिये।

पुराना अग्निमांद्य होने पर पचनेन्द्रिय संस्था (Digestion Sources) अशक्त हो जाती है। जिस से पाचक रस (Gastric Juice) का व्यवस्थित निर्माण नहीं होता। अपचन, पेट में वायु का भरा रहना, अफरा, दूषित डकार, रस की उतपत्त योग्य न होने से रक्त आदि धातुओं में क्षीणता आकर शरीर कृश और अशक्त हो जाना आदि लक्षण प्रतीत होते है। उस पर प्रवाल पंचामृत रस का उपयोग उत्तम होता है।

पित्त की विकृति से अतिसार (Diarrhoea) उत्पन्न हुआ हो, फिर उसी से संग्रहणी (Chronic Diarrhoea) हुई हो, तो भी प्रवाल पंचामृत रस का प्रयोग करना चाहिये। इससे पित्त प्रधान अतिसार और संग्रहणी में पित्तप्रकोप का शमन हो कर सत्वर रोगनिवारण होता है।

प्रमेह के विकार में पुराना अपचन कारण हो या तीव्र पित्तदोष की प्रधानता हो, तो प्रवाल पंचामृत रस उत्कृष्ट कार्य करता है। अतिशय प्यास, इस तरह मूत्र का प्रमाण अधिक और बार-बार होना, मूत्र काला, नीला, अति पीला या अति लाल होना, चिपचिपा पसीना सारे शरीर में और हाथ-पैरों के तलो में दाह, बार-बार गला सुखना, पानी पीने पर भी संतोष न होना आदि लक्षण होने पर प्रवाल पंचामृत रस देना चाहिये।

मात्रा: 

125 से 250 mg दिन में 2 बार शहद और पीपल, गुलकंद, मात्र शहद, नींबू के रस अथवा अनार के रस के साथ देवें।




Monday, May 13, 2019

आयुर्वेद और केसर का रिश्ता। Benefits of Saffron according to ayurved.

आयुर्वेद के अनुसार केसर और स्वास्थ में रिश्ता Ayurveda and Saffron:

स्वास्थ्य को मिलने वाले केसर के फायदे तो आप ज़रूर जानते होंगे। दूध में केसर डालकर पीना काफी अच्छा होता है, खासतौर से गर्भवती महिलाओं के लिए। यह एक कामशक्ति बढ़ाने वाला रसायन है। महिलाओं की कुछ बीमारियों में यह रामबाण साबित होता है। 


बच्चे के जन्म के बाद गर्भाशय की सफाई के लिए कुछ दिनों तक इसका नियमित सेवन करना बहुत अच्छा रहता है। केसर को सभी मसालों का राजा कहा जाता है। इसे सैफ्रॉन या जाफरान के नाम से भी जानते हैं। यह दुनियाभर में सबसे कीमती मसालों में से एक है। यह कई फ्लेवर में पाया जाता है और स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी होता है। क्योंकि केसर सौंदर्य निखारने में सहयोगी है, इसलिए सुंदर एवं गोरे बच्चे को पाने के लिए गर्भवती महिलाएं अपने आहार में केसर को शामिल करने की कोशिश करती हैं।


केसर इतना महंगा क्यों Why Saffron too costly?

यह हमेशा मुद्दा होता है कि यह इतना महंगा क्यों , इसका कारण इसके उत्पादन में मौसम की बाध्यता सबसे  मुख्य है।मगर ऐसी क्या बात है इस केसर में जो यह इतना महंगा है इसके अन्य भी कारण है जैसे खाद्य पदार्थ तो और भी कई हैं जो हमें काफी फायदा देते हैं। 



केसर का अनूठा स्वाद इसमें मौजूद केमिकल कंपाउंड पिक्रोक्रोकिन और सैफ्रानाल के कारण होता है इसलिए इसके अनोखे स्वाद की वजह से केसर का उपयोग दुनियाभर के कई पाक व्यंजनों में किया जाता है। केसर के इतना महंगा होने की क्या वजह है? इसके पीछे छिपा है एक ऐसा इतिहास जिसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं। रोजाना थोड़ी मात्रा में केसर लेने से शरीर में कई प्रकार के रोग नहीं होते हैं। 

केसर के फायदे Benefits of Saffron:


१) अगर ज्यादा सर्दी-खांसी हो रही हो तो केसर दी जाती है क्योंकि ये कफ का नाश करने वाली औषधि है। शिशुओं को अगर सर्दी जकड़ ले और नाक बंद हो जाये तो मां के दूध में केसर मिलाकर उसके माथे और नाक पर मला जाये तो सर्दी का प्रकोप कम होता है और उसे आराम मिलता है। 



२) रात को सोने से पहले दूध में केसर डालकर पीने से अनिद्रा की शिकायत दूर होती है। अनिद्रा की शिकायत को दूर करने में भी केसर काफी उपयोगी होता है। इसके साथ ही यह अवसाद को भी दूर करने में मदद करता है। 



३) केसर की एक विशेष किस्म गठिया या वात रोग में राहत प्रदान करती है। केसर में पाये जाने वाला क्रोसेटिन मस्तिष्क में ऑक्सीजेनेशन को बढ़ाता है जिसके परिणामस्वरूप अर्थराइटिस के इलाज में काफी आसानी हो जाती है। 



४) सिर दर्द को दूर करने के लिए केसर का उपयोग किया जा सकता है। सिर दर्द होने पर चंदन और केसर को मिलाकर सिर पर इसका लेप लगाने से सिर दर्द में राहत मिलती है।

५) महिलाओं की कई शिकायतें जैसे - मासिक चक्र में अनियमिता, गर्भाशय की सूजन, मासिक चक्र के समय दर्द होने जैसी समस्याओं में केसर का सेवन करने से आराम मिलता है।



६) त्वचा को निखारने और सुन्दर बनाने के भी गुण केसर में पाए जाते है। महिलाएं अगर इसका सही तरीके से और सही मात्रा में सेवन करें तो त्वचा सुन्दर लगने लगती है। 

७) केसर और दूध का मिलाप बहुत प्रचलित तथा काफी चर्चित है, यह कई तरह की शारीरिक परेशानियां तो दूर करता ही है। साथ ही हमें ऊर्जा भी देता है, ताकि अनचाही छोटी-छोटी बीमारियों से बचा जा सके।

८) पुरूषों में वीर्य शक्ति बढ़ाने हेतु शहद, बादाम और केसर लेने से फायदा होता है। पेट संबंधित बीमारियों के इलाज में केसर बहुत फायदेमंद है। 





Saturday, May 11, 2019

गुड़ के सेवन के फायदे और नुकसान। Benefits of jaggery.

आयुर्वेद में गुड़ के सेवन को उत्तम क्यों बताया गया है Why ayurved suggest to eat Jaggery? 

यदि आप अपने मीठा खाने के शौक को भी पूरा करना चाहते हैं और अपनी सेहत के साथ भी समझौता नहीं करना चाहते हैं तो गुड़ आपके लिए एक बेस्ट आप्शन होता हैं। आयुर्वेद में भी गुड के उपयोग को फ़ायदेमंद बताया गया है, यह फेफड़ो में जमी गंदगी को सॉफ करता है। गुड में बहुत से औषधीय गुण होते हैं, कुछ लोग इसे ऐसे ही चबाना पसंद करते हैं, तो कुछ दूध या चाय में मिलकर पीते हैं, लेकिन आज हम आपको गुड़ खाने का एक ऐसा हैल्दी तरीका बताने जा रहे हैं जिसके प्रयोग से आपको कई तरह की स्वास्थ सम्बंधित परेशानियों से छुटकार मिल जाएगा।



गुड़ में चीनी का बाहुल्य होता है और इसकी मात्रा कभी कभी 90 प्रतिशत से भी अधिक तक पहुँच जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें ग्लूकोज़, फ्रुक्टोज़, खनिज (चूना, पोटाश, फासफ़ोरस आदि) भी अल्प मात्रा में रहते हैं। इसमें जल का भी थोड़ा अंश रहता है जो ऋतु के अनुसार घटता बढ़ता रहता है। भारत एक ऐसा देश हैं जहाँ अक्सर लोगो को मीठा खाने का बड़ा शौक होता हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बढ़ती हेल्थ प्रॉब्लम के चलते अधिक मीठा खाने से परहेज करते हैं। आमतौर पर लोग सर्दियों के मौसम में ही इसका प्रयोग करते हैं, जबकि इसे साल भर खाया जा सकता है और शरीर को इसे ढेरों लाभ भी मिलते हैं। इसे आपको अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए।

गुड़ के प्रकार Type of Jaggery:


गुड़ कई प्रकार और आकार का होते हुए भी वस्तुत: एक ही पदार्थ है। ताड़ से प्राप्त ताड़ का गुड़ कहा जाता है, पर गन्ने से प्राप्त गुड़ इतना प्रचलित है कि इसे लोग केवल गुड़ ही कहते हैं। इसके विपरीत भी गुड़ का कई तरह से वर्गीकरण किया जा सकता है, जैसे साफ किया हुआ गुड़ एवं बिना साफ किया हुआ गुड़, छोटी पिंडियों एवं बड़ी पिंडियोंवाला आदि। 



रख दिए जाने पर, अर्थात् पुराना होने पर, इसके गुणों में परिवर्तन होता जाता है। इसलिये नया गुड़, एवं पुराना गुड़ इस भाँति भी उपयोग में इसका विवरण आता है। गुड़ स्‍वाद का ही नहीं बल्‍कि सेहत का भी खजाना है, ऐसा इसलिए कहा जाता है क्‍योंकि अकसर डॉक्‍टर बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य के लिए मीठे खासतौर से चीनी से दूर रहने की सलाह देते हैं। गुड़ न सिर्फ खाने में टेस्‍टी है बल्‍कि यह कई औषध‍िय गुणों से भरपूर है, यह एक ऐसा सुपर फूड है जिसके फायदों के बारे बहुत कम लोग ही जानते हैं। अतः गुड़ के कुछ फायदे इस प्रकार है:

गुड़ के फायदे Benefits of Jaggery:


१) गुड को दूध या पानी में मिलाकर पीने से शरीर में थकान दूर होती है और उर्जा मिलती है। गुड़ शरीर को मजबूत और एक्टिव बनाए रखता है। शरीरिक कमजोरी दूर करने के लिए दूध के साथ गुड़ का सेवन करने से ताकत आती है और शरीर ऊर्जावान बना रहता है।

२) कई लोगो को समस्यां रहती हैं कि रोज सुबह उठते ही उनका पेट अच्छे से साफ़ नहीं होता हैं, इसे हम कब्ज के नाम से भी जानते हैं। ऐसी स्थिति में खाली पेट गुड़ और गुनगुना पानी लेने से लाभ मिलता हैं।

३) भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार गुड़ का उपभोग गले और फेफड़ों के संक्रमण के उपचार में लाभदायक होता है। गुड़ के प्रयोग से कोयले और सिलिका धूल से होने वाली फेफड़ों की क्षति को रोका जा सकता है। 




४) गुड़ आयरन का बहुत बड़ा स्रोत है, अगर आपका हिमोग्‍लोबिन कम है तो रोजाना गुड़ खाने से तुरंत लाभ मिलने लगेगा। गुड़ खाने से शरीर में लाल रक्‍त कोश‍िकाओं की मात्रा बढ़ जाती है, यही वजह है कि प्रेग्‍नेंट महिलाओं को डॉक्‍टर गुड़ खाने की सलाह देते हैं। एनिमिया के मरीजों के लिए तो गुड़ अमृत के समान है।

५) गुड के सेवन से त्वचा के हानिकारक टॉक्सिन्स बाहर निकलते है जिससे त्वचा सॉफ रहती है। ये शरीर में खून के प्रवाह यानी ब्लड सर्कुलेशन को सामान्य रखता हैं, जिसके चलते दिल सम्बंधित बीमारियाँ नहीं होती हैं।

६) गुड़ ब्‍लड प्रेशर को कंट्रोल करने का काम भी करता है। खासतौर पर हाई ब्‍लड प्रेशर से परेशान लोगों को रोजाना गुड़ खाने की सलाह दी जाती है यदि आपो हमेशा एसिडिटी या गैस की समस्यां रहती हैं तो वो भी इस गुड़ और पानी के कॉम्बिनेशन से हल हो जाएगी।

७) गुड़ सर्दी-जुकाम भगाने में काफी असरदार है। काली मिर्च और अदरक के साथ गुड़ खाने से सर्दी-जुकाम में आराम मिलत है। अगर किसी को खांसी की श‍िकायत है तो उसे चीनी के बजाए गुड़ खाना चाहिए। गुड़ को अदरक के साथ गर्म कर खाने से गले की खराश और जलन में राहत मिलती है।

गुड़ खाने के नुकसान :

गुड़ की तासीर गर्म होती है अतः कुछ लोगो को इसके विपरीत प्रभाव हो जाते है। गर्म या ताजा गुड़ खाने से बदहजमी और पेट खराब होने की संभावना होती है।
गर्मी के दिनों में कुछ लोगो मे नाक से खून आने की समस्या भी हो जाती है, यह गुड़ के गर्म तासीर की बजह से होता है, अतः उन्हें गर्मी के मौसम में गुड़ के सेवन पर परहेज रखना चाहिए।



Friday, May 10, 2019

औषधीय गुणों से भरपूर है "मेंहदी" का पौधा। Benefits of Henna or Mehndi.

मेहदी और उसके पौधा कितना है लाभदायक :

हाथों पर रचने वाली खूबसूरत मेहंदी के तो आप दीवाने होंगे ही, इसके सेहत और ब्यूटी के फायदे जानेंगे तो और भी पसंद करने लगेंगे इसे। जानिए आपकी सेहत और सौंदर्य को निखारने में कितनी कारगर है मेहदी या हिना सबसे अच्‍छी बाल सौंदर्य सामग्री में से एक है जिसे भारत ने अन्‍य देशों के साथ साझा किया है। सदियों से महिलाएं मेंहदी के प्राकृतिक गुणों का उपयोग अपने बालों को मजबूत करने, उन्हें पोषण देने और सुंदर बनाने के लिए कर रही है। वे बालों के उपचार के लिए मेंहदी के पत्‍तों का उपयोग करती हैं। आधुनिक महिलाएं बालों के उपचार के लिए मेंहदी पाउडर का उपयोग भी करती हैं।



प्राचीन समय से ही मेंहदी का उपयोग कैंसर, बढ़ी हुई स्‍पलीन, सिरदर्द, पीलिया, त्‍वचा रोग और परजीवी के कारण होने वाले गंभीर दस्‍त के लिए किया जाता है। इन दिनों लोग पेट और आंतों के अल्‍सर के उपचार के लिए हिना का उपयोग करते हैं। मेंहदी का उपयोग डैंड्रफ, एक्जिमा, स्‍टेबीज, फंगल संक्रमण और घावों के उपचार के लिए भी किया जाता है।



मेहदी के स्तेमाल से होने वाले फायदे:


१) मेहदी की तासीर ठंडी होने के कारण मेहंदी का उपयोग शरीर में बढ़ी हुई गर्मी को कम करने में किया जाता है। हाथों और पैर के तलवों में मेहंदी लगाने से शरीर की गर्मी कम होती है।



२) उच्‍च रक्‍तचाप के रोगियों के त्‍लवों तथा हथेलियों पर मेहंदी का लेप समय समय पर लगाना लाभप्रद होता है। इससे अनिद्रा दूर हो कर रक्‍तचाप सामान्‍य होने लगता है।

३) खून साफ करने के लिए मेहंदी को औषधि के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए रात को साफ पानी में मेहंदी भिगोकर रखें और सुबह इसे छानकर पिएं।

४) घुटनों या जोड़ों में दर्द की समस्या होने पर मेहंदी और अरंडी के पत्तों को बराबर मात्रा में पीस लें और इस मिश्रण को हल्का सा गर्म करके घुटनों पर लेप करें।

४) मेहंदी के फूल उत्‍तेजक, हृदय को बल देने वाले होते हैं। इसका काढ़ा हृदय को संरक्षण करने तथा नींद लाने के लिये दिया जाता है।

५) सिरदर्द या माइग्रेन जैसी परेशानियों के लिए भी मेहंदी एक बेहतरीन विकल्प है। ठंडक भरी मेहंदी को पीसकर सिर पर लगाने से काफी फायदा होगा।

६) ताजा हरी पत्‍तियों को पानी के साथ पीस कर लेप करने से अधिक लाभ होता है। इससे गर्मी की जलन से आराम मिलता है। तलवों पर लेप करने से नकसीर बंद हो जाती है।

७) शरीर के किसी स्थान पर जल जाने पर मेहंदी की छाल या पत्ते लेकर पीस लीजिए और लेप तैयार किजिए। इस लेप को जले हुए स्थान पर लगाने से घाव जल्दी ठीक होगा।

८) मेहंदी के बीजों का उपयोग बुखार एवं मानसिक रोग में किया जाता है। खूनी दस्‍त में बीजों का उपचार है।



Thursday, May 2, 2019

योग के लाभ एवं मुख्य योगासन। Benefits of Yoga and top Yogasan.

योग और योगासन का परिचय:

योग का शाब्दिक अर्थ होता है जोड़ना, अतः जो योग कि विद्या योगाचार्य महर्षि पतंजलि ने बताया है उनके अनुसार "चित्त को एक जगह में स्थापित करना योग कहलाता है, जहाँ पर जीवात्मा को परमात्मा से मिलाया जाता है और वो एक हो जाते है वही योग है।" महाऋषि पतंजलि ने योग के सम्पूर्ण रहस्य को योगदर्शन में सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया है।

 


योगासन से तात्पर्य होता है कि शरीर की वह स्थिति जब शरीर और मन को शांत स्थिति में रखा गया है और वह सुख का अनुभव कर रहा है। योगासन दो प्रकार के होते है:

१) स्थिर आसन:
वह आसन जो बिना गति के बिना किसी प्रकार की शक्ति के प्रयोग से मात्र अभ्यास के माध्यम से स्थिर रखा गया हो स्थिर आसन कहलाता है।

२) गतिशील आसन:
यह उस तरह का आसन होता है जिसमे शरीर को शक्ति से साथ गतिशील रख कर किया जाता है।

कुछ योगासन जिन्हें आसानी के साथ किया जा सके तथा लाभ:


१) शुखासन:


 


शुखासन एक ऐसा योग है जिसमे मन को शान्ति प्रदान कि जाति है। यह बैठ कर किया जाने वाला आसन है जिसमे श्वास को सरलता पूर्वक अंदर और बाहर किया जाता है।

२) ताड़ासन:


 


ताड़ासन खड़े होकर किया जाने वाला योग है जिसमे दोनों हांथो को ऊपर उल्टा जोड़कर खिंचाव किया जाता है। इस आसन का अभ्यास शरीर को सुडौल, संतुलन और दृहत मिलती है।

३) त्रिकोणासन:


 


त्रिकोणासन में त्रिकोण का आकार बनता है इस योग का अभ्यास शरीर को लचीला और मन के तनाव को दूर करने वाला होता है।

४) बज्रासन:


 


बज्रासन बैठकर किया जाने वाला आसन है। यह शरीर को सुडौल और सुदृढ़ बनाता है, पाचन में लाभदायक एवं पीठ दर्द को आराम देने वाला योग अभ्यास है।

५) नमस्कार आसन:


 


नमस्कार आसन एक आसान और योग की सुरुआत में किया जाने वाला योग आसन है, इसमे दोनों हांथो को जोड़कर ऊपर उठाया जाता है।

६) वृक्षासन:


 



वृक्षासन एक पैर में वृक्ष के आकार में किया जाने वाला महत्वपूर्ण योग अभ्यास है। यह तनाव को दूर करता है मन को शांत रखने में सहायक एवं पैरों को मजबूती प्रदान करने वाला है।

७) कोडासन:

 



कोडासन पैरों को कोड की आकृति बनाने वाला आसन है। यह योग अभ्यास हड्डियों को एवं कमर को मजबूत करने वाला होता है।

८) भुजंग आसन:


 


भुजंगासन में उलट लेटकर कमर के ऊपरी भाग को ऊपर उठाया जाता है। इस योग अभ्यास से मेरुदंड में मजबूती आती है तथा कमर की मांसपेशियों को आराम मिलता है।

९) गोमुखासन:


 


गोमुखासन बैठ कर किया जाने वाला प्रमुख आसन है, इसमे शरीर को स्थिर करके पीछे हाथ को जोड़ा जाता है। यह शरीर को लचीला बनाने में मदत करता है।

१०) नटराज आसन:

 



यह आसन थोड़ा कठिन होता परंतु निरंतर अभ्यास किये जाने से सम्पूर्ण शरीर को लाभदायक होता है एवं शरीर को मजबूत करता है।



Saturday, April 27, 2019

फूलों और वनस्पतियों का सेहद में प्रभाव। Health Benefits of Flowers.

फूलों का सेहद में बहुत अच्छा प्रभाव होता है, जिसका स्तेमाल आयुर्वेदिक चिकित्सा में किया जाता रहा है:

ज्यादातर लोग हर तरह के फूलों का आनंद लेते हैं, आकार, या रूप के कारण इस सुंदरता को प्राप्त करते हैं। सुंदर होने के अलावा, पौधों और फूलों को किसी व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य को उत्तम बनाने में लाभकारी होता हैं।  सुंदरता और जीवन के अलावा जो फूल हमारे घरों और रहने के स्थानों में लगाए जाते हैं, वे फूल स्वास्थ्य में लाभ प्रदान करते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि हम बीमार या अस्पताल में भर्ती मरीजों को फूल क्यों देते हैं? इस लेख में, हम आपको उन फायदों के बारे में बताएंगे जो फूल मनुष्यों को लाभकारी हो सकते हैं।



यहां आपके रोजमर्रा के जीवन के ताजा खिले हुए फूलों से होने वाले कुछ स्वास्थ्य लाभ दिए गए हैं:

भावनात्मक स्वास्थ्य सुधार में लाभदायक :

फूलों को प्राप्त करना, चाहे वे किसी अन्य व्यक्ति से भेजे गए हों या आपने उन्हें अपने लिए खरीदा हो, आपको तत्काल मानसिक बढ़ावा देती है। फूलों का एक गुलदस्ता एक संकेत देता है कि जिसने आपको दिया है वो आपकी परवाह करता है, और वो व्यक्ति आपकी भलाई के लिए बहुत कुछ कर सकता है। चमकीले रंगों और सुखदायक खुशबू के साथ एक सुंदर फूल का गुलदस्ता एक ही समय में एक कमरे और आपके मूड को उज्ज्वल कर देता है।



मेमोरी और एकाग्रता में लाभकारी:

बहुत से लोगों के पास एक ऐसा क्षण होता है जहां वे अपनी एकाग्रता को पूरी तरह से खो देते हैं। रिक्त स्थान में पौधों को रखने से एकाग्रता और स्मृति बढ़ाने में मदद मिल सकती है। पौधे हवा को ऑक्सीजन देते हैं, आपके मस्तिष्क की कोशिकाओं को बढ़ाते हैं और आप अच्छा महसूस करते हैं। आप उन पौधों का चयन कर सकते है जिनका आसानी से देखभाल और संयोजन किया जा सकता है। कुछ ऐसे पौधों  है जिसे सप्ताह में केवल एक बार पानी की आवश्यकता होती है और जल्दी से बढ़ते हैं। कुछ पौधें और फूल मनोरंजक होते हैं, जो खुशियों के साथ ही साथ आपके मस्तिष्क को सुपरचार्ज करने के लिए भी अच्छा होता है।



फूल और पौधे हवा को शुद्ध करते हैं:

फूल एवं वनस्पति किसी भी अन्य पौधे की तरह हवा को शुद्ध करते है हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसे डिटॉक्स करने में आवश्यक भूमिका निभाते हैं। सौभाग्य से प्रकृति के संतुलन बनाने की ये अहम प्रणाली है। इनडोर फूल हमारे घरों में उपयोग किए जाने से कुछ उत्पादों द्वारा उत्पन्न पर्यावरण में विषाक्त गैसों को अवशोषित करते हैं। जब हम स्वच्छ हवा में सांस लेते हैं, तो हमारी सांस प्रणाली के संक्रमण से पीड़ित होने की संभावना कम हो जाती हैं।



तनाव को कम करने में मदत करते है:

अच्छी नींद में मददगार होते है साथ ही तनाव को कम करने के लिए फूलों की गंध बहुत कारगर हो सकती है। मेंहदी की एक ताजा टहनी सिरदर्द और तनाव दोनों में एक साथ मदद कर सकती है। लैवेंडर या कैमोमाइल जैसी कुछ आपकी परेशानियां दूर कर सकती हैं।



फूल त्वचा के लिए अच्छे होते हैं:

फूल का स्तेमाल उज्ज्वल, स्वस्थ त्वचा प्राप्त करने का एक प्राकृतिक तरीका है। जब आप अपने घर या कार्यालय में फूल रखते हैं, तो वे पर्यावरण में नमी जारी करते हैं। नमी आपकी त्वचा को अत्यधिक शुष्क होने से बचाती है। लैवेंडर त्वचा की सूखापन के लिए एक आदर्श उपाय है, यह पर्यावरण को बहुत अधिक नमी जारी करता है जो आपकी त्वचा स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

Thursday, April 25, 2019

हार्ट अटैक से बचाव में उपयोगी है आयुर्वेद, जानिए कुछ उपाय..। Ayurvedic treatment of heart attack, prevention and remedies.

तेजी से बढ़ती हार्ट अटैक की समस्या का कारण:

अनियमित और अनियंत्रित दिनचर्या, तनाव और असंतुलित भोजन तेजी से बढ़ती हार्ट अटैक की समस्या का प्रमुख कारण है। आयुर्वेदिक पद्यति से इलाज़ एवं परहेज से इसके बचाव संभव है। भगवान व्रह्मा ने जब पृथ्वी का सृजन किया तो प्रकृति में ही रोगों से बचाव के तत्व प्रदान किया तथा यदि कोई बीमारी हो तो उसका इलाज भी प्रकृति के माध्यम से ही संभव बनाया। हृदय शरीर का अति महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील अंग है अतः इसे संतुलन में रखना अतिआवश्यक है।


क्या एवं क्यों होता है हार्ट अटैक(हृदय घात):

उपरोक्त कारणो के अलावा अतिरिक्त प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट के सेवन से कोलेस्ट्रॉल रक्त नलिकाओं को जमा होने लगता है, औऱ ये कोलेस्ट्रॉल धमनियों में रक्त के बहाव को बाधित करने लगता है। कोलेस्ट्रॉल किसी मोम की तरह जमा होने से जब रक्त का बहाव बाधित होता है तो तीव्र दर्द एवं सांस लेले में परेसानी होने लगती है।



आयुर्वेद के अनुसार हार्ट अटैक से बचाव के परहेज:

आयुर्वेद का सिद्धांत है कि इलाज़ हमेशा दोनों में बीमारियों के कारण और निवारण में किया जाता है। अतः हार्ट अटैक से बचने के लिए आयुर्वेद में परहेज का महत्वपूर्ण स्थान है, ये परहेज खान-पान के होते है, दिनचर्या में बदलाव के होते है।साथ ही व्यायाम महत्पूर्ण है हार्ट अटैक से बचाव में। कुछ परहेज इस प्रकार है:

१) धूम्रपान , शराब या किसी भी तरह की नसीले पदार्थों के सेवन से परहेज जरूरी होता है। 

२) चाय , कॉफी जैसे पदार्थों के अधिक सेवन से बचाव करना जरूरी होता है। साथ ही चॉकलेट एवं आइस क्रीम के सेवन से परहेज आवश्यक है।

३) अधिक तली हुए भोजन , पैकड बंद भोजन, फ़ास्टफूड और जंकफूड से परहेज जरूरी होता है। रिफाइंड तेल ,खोया, पनीर एवं मक्खन का सेवन नही करना है। 



आयुर्वेद के अनुसार कुछ घरेलू एवं आवश्यक खाद्य पदार्थ जो हार्ट अटैक से बचाव करते है:

आयुर्वेद के अनुसार कुछ प्राकृतिक एवं घरेलू तरीको के स्तेमाल से हार्ट अटैक से बचाव किया जाना संभव है, उन में से कुछ उपाय इस प्रकार है:

१) व्यायाम: नियमित व्यायाम एवं टहलने से कोलेस्ट्रॉल में कमी आती है, तथा इस घातक समस्या को दूर किया जा सकता है।

२) तनाव मुक्ति: तनावपूर्ण जीवन इस समस्या का महत्वपूर्ण कारण है, अतः किसी भी तरीके से तनाव को दूर करना जरूरी है। योग तनाव को दूर करने में बहुत कारगर होता है अतः योग को अपनाकर तनावमुक्त रहा जा सकता है।

३) अंकुरित अनाज जैसे देसी चना , मूंग, गेंहू का सेवन करना चाहिए।

४) फलीदार सब्जियों जैसे बीन्स, मटर, सेम का सेवन करना चाहिए।

५) पपीता, अनार, अंगूर, सेव जैसे फलों का सेवन करना लाभकारी होता है।

६) पीपल, हल्दी, केसर मिला हिअ गुनगुना दूध का सोने से पहने सेवन करना चाहिए।

७) आयोडीन नमक की जगह सेंधा नमक का इस्तेमाल करे, साथ ही शक्कर और रिफाइंड तेल के सेवन से बचे।

Monday, April 22, 2019

आयुर्वेद का परिचय। Introduction of Ayurveda.

आयुर्वेद का परिचय Introduction of Ayurveda:

आयुर्वेद एक भारतीय चिकित्सा पद्यति है, जिसकी सुरुआत कई वर्षों पहले भारत में हुई थी। भारतीय आयुर्वेद का पूरा रहस्य भारत के इतिहास से जुडा हुआ है। आज के दिन में विश्व भर के ज्यादातर आधुनिक और वैकल्पिक चिकित्सा, आयुर्वेद से लिया गया है। प्राचीन आयुर्वेद चिकित्सा की शुरुवात देवी-देवताओं के ग्रंथों से हुआ था और बाद में यह मानव चिकित्सा तक पहुंचा।


सुश्रुत संहिता (Sushruta Samhita) में यह साफ़-साफ लिखा गया है कि धनवंतरी, ने किस प्रकार से वाराणसी के एक पौराणिक राजा के रूप में अवतार लिया और उसके बाद कुछ बुद्धिमान चिकित्सकों और खुद आचार्य सुश्रुत को भी दवाइयों के विषय में ज्ञान दिया।

कैसे किया जाता है आयुर्वेद में उपचार How to Treat in ayurveda:

आयुर्वेद के उपचार में ज्यादातर हर्बल चीजों का उपयोग होता है। ग्रंथों के अनुसार कुछ खनिज और धातु पदार्थ का भी उपयोग औषधि बनाने में किया जाता था। यहाँ तक की प्राचीन आयुर्वेद ग्रांटों से सर्जरी के कुछ तरीके भी सीखे गए हैं जैसे नासिकासंधान (Rhinoplasty), पेरिनिअल लिथोटोमी (Perineal Lithotomy), घावों की सिलाई (Wounds Suturing), आदि। वैसे तो आयुर्वेद के चिकित्सा को वैज्ञानिक तौर पे माना गया है पर इसे वैज्ञानिक तौर पर पालन ना किया जाने वाला चिकित्सा प्रणाली कहा जाता है। पर ऐसे भी बहित सारे शोधकर्ता हैं जो आयुर्वेदिक चिकित्सा को विज्ञानं से जुड़ा (Proto-Science) मानते हैं।


आयुर्वेद चिकित्सा और और आधुनिक अग्रेजी चिकित्सा का अंतर Differences b/w Ayurvedic treatment and allopathy treatment:

आयुर्वेद का हमारे जीवन में बहुत महत्व है । आज का मानव आयुर्वेदिक दवाइयों को छोड़कर अंग्रेजी दवाइयों का उपयोग कर रहा है । जिससे मनुष्य का एक रोग तो ठीक हो जाता है लेकिन उन दवाइयों का उपयोग करने के बाद मनुष्य के शरीर में कुछ और नई बीमारियां उत्पन्न हो जाती है । जिससे वह शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है। लेकिन आयुर्वेदिक औषधि के द्वारा उपचार करके हम व्यक्ति के स्वास्थय को ठीक करके उनको  होने वाले रोगों से भी बचाते है । 
आयुर्वेद में ऐसी जड़ी - बूटियों हैंजिससे रोगी की हर बीमारी को ध्यान में रखते हुए उनका उपचार किया जाता है । जो भी व्यक्ति आयुर्वेदिक पद्धति से अपना इलाज करवाता है। तो चिकित्सक पहले रोगी के शरीरकी अवस्था मन और आत्मा कीअवस्था , वात , पित्त , कफ और मल और मूत्र का परीक्षण करके, पीड़ित व्यक्ति का उपचार आरम्भ करता है । इस प्रकार की प्रक्रिया को सांस्थानिक पद्धति कहा जाता है । इसमें रोगी केलक्षणों पर भी ध्यान दिया जाता है । आयुर्वेद चिकित्स्या में प्रयोग होनेवाली औषधि एक प्रकार का रसायन होता है । 



आयुर्वेदिक औषधि का प्रयोग किस प्रकार करना चाहिए , और इसके उपयोग  के बाद क्या खाना चाहिए , किन चीजो का परहेज रखना चाहिए। इन सभी बातों का विस्तृत वर्णन आयुर्वेद में किया गया है ।



Thursday, April 18, 2019

पांच मुख्य भारतीय प्राकृतिक तिलहन के फायदे। Benefits Of Five Natural Indian Eatable OIL

प्रमुख भारतीय तिलहन और उनके फायदे:

प्राचीन काल से भारतीय भोजन में तेल का स्तेमाल भोजन को पकाने में किया जाता रहा है। वैदिक काल से ही शुद्ध घी को उसमे गाय के घी को सर्वथा शेष्ट माना गया है, इसी लिए हवन आदि कार्यों में इसका उपयोग होता रहा है। परंतु बाद में जब कृषि विस्तार हुआ, तिल का तेल सबसे प्राचीन और उत्तम है जिसका खड्यापदार्थ में उपयोग शुरु हुआ। 


बाद में अलग अलग प्रान्तों में उपलभ्य तिलहनों का उत्पादन भी हुआ जिसमें मुख्य पश्चिमी भारत मे मूमफली के तेल, दक्षिण भारत मे नारियल के तेल तथा उत्तर और अन्य भागों में सरसों(राई) के तेल का स्तेमाल होना सुरु हुआ। इन तेलों को भोजन पकाने में स्तेमाल किया जाता रहा है, क्योंकि इनको घानी में तैयार किया जाता है।

१. मूंगफली का तेल



फायदे:
मूंगफली का तेल शरीर में वसा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे आपको अपना वजन कम करने में मदद मिलती है। यह तेल कैंसर से लड़ने के अलावा आपकी पाचन क्रिया को भी ठीक करता है। मूंगफली का हृदय से जुड़ी समस्याओं में फायदेमंद होता है। जिन लोगों को डायबटीज की समस्‍या होती है उनके लिए मूंगफली के तेल लाभप्रद होता है। इस तेल के सेवन से शरीर में इंसुलिन की पर्याप्‍त मात्रा बनी रहती है। इसमें असंतृप्‍त वसा होता है उच्च रक्तचाप से बचने में हमारी मदद करता है साथ ही दिल की रक्षा करता है। इसके अलावा इसमें इसमें फैटी एसिड, असंतुलित मात्रा में नहीं होता, जिसके कारण शरीर में फैट अधिक नहीं बढ़ता।

नुकसान:
जिन लोंगो को मूंगफली से  एलर्जी हो, उनकी सेहत के लिए मूंगफली का तेल नुकसानदायक होता है। मूँगफली के रिफाइंड आयल का प्रयोग सेहत के लिए फायदेमंद नहीं होता है। केवल मूंगफाली हीं नहीं, किसी भी वनस्पति का तेल, जो रिफाइंड प्रक्रिया से तैयार किया गया हो, सेहत के लिए नुकसानदायक होता है गर्भवती महिलाओं एवं शिशु को स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए मूंगफली के तेल का ज्यादा सेवन सेहत के लिए हानिकारक होता है।

२. तिल का तेल



फायदे:
तिल के तेल के फायदे इसमें मौजूद औषधीय गुणों के कारण और बढ़ जाते है, इस कारण इसे प्राचीन भारत के वेदों में मनुष्यों के लिए बिल्कुल सही बताया गया था। इस तेल में एक जीवाणुरोधी गुण होते है जो सामान्य त्वचा रोगजनकों जैसे स्‍ट्रेप्‍टोकोकस और स्‍टाफिलोकोकस और एथलीट पैर जैसी त्वचा कवक को ठीक करता ह

३. सरसों का तेल




फायदे:
दर्दनाशक के रूप में जोड़ों के दर्द में सरसों के तेल की मालिश करना बहुत फायदेमंद होता है। त्वचा के लिए फायदेमंद सरसों का तेल त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद है। भूख बढ़ाने में मददगार  के साथ साथ वजन घटाने में मददगार होता है।
अस्थमा की रोकथाम और दांत दर्द में फायदेमंद होता है साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए फायदेमंद होता है।


४. नारियल का तेल




फायदे:
आयुर्वेद में पित्त वृद्धि होने पर नारियल तेल का इस्तेमाल गठिया, जोड़ों के दर्द को कम करने के लिए किया जाता है। यह हड्डियों में कैल्शियम और मैग्नीशियम अवशोषित करने की क्षमता में सुधार करता है। नारियल तेल के इस्तेमाल से वजन भी कम किया जा सकता है

५. अलसी का तेल




फायदे:
अलसी का तेल शरीर और त्वचा के लिए कई कारणों से लाभदायक है। अलसी के तेल का प्रयोग खाने में, त्वचा पर लगाने में, बालों में एवं अन्य कई घरेलु कार्यों के लिए किया जाता है। ऑमेगा 3 हमारे शरीर और त्वचा के लिए बहुत उपयोगी होता है। इसका उपयोग कई सौंदर्य पदार्थों और घरेलु चीजों के लिए किया जाता है।

Wednesday, April 10, 2019

हिन्दू धर्म की को परम्पराए जिनके प्रभाव को आयुर्वेद और विज्ञान भी मानता है। Hindu Traditions Scientific effects.

हिन्दू या भारतीय परंपरा जिनके महत्व विज्ञान और आयुर्वेद भी सिद्ध करता है:

कई हिन्दू भारतीय परंपराओं के विशेष प्रभाव है जिनको आयुर्वेद एवं आधुनिक विज्ञान भी सिद्ध करता है। इन परंपराओं को अज्ञानतावश कई विरोधी और विदेशी लोग पिछड़ापन और आडंबर बताते थे आज वही उनकी विशेषता जानकर सर्मिन्दा होते है। हमे उन्ही पारंपरिक विधियों  का पालन करना चाहिए एवं आने वाली पीढ़ी को उसका मतत्व समझाना चाहिए।

यहां कुछ हिन्दू परंपराये है जिनका वैज्ञानिक तर्क है, और आयुर्वेद भी इनके महत्त्व की विवेचना करता है:


१) नमस्ते करना:

हाथ जोड़कर नमस्कार करना हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण माध्यम है मिलने जुलने का, जब हम हाथ जोड़कर नमस्कार करते है तो उंगलियों के एक दूसरे पर दवाव होता है जिशसे चेहरे, मस्तिष्क और आंखों पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ साथ दूसरे से हाँथ न मिलने के कारण हम दूसरे के संपर्क में नही आते और वैक्टीरिया, वायरस का संचार नही हो पाता है।

२) तिलक लगाना

मस्तक पर तिलक लगाने से आंखों के मध्य की नस में दवाब होता है जिनसे मस्तिष्क में रक्त का संचार संतुलन में रहता है। साथ ही चेहरे की मांसपेशियों में रक्त एवं ऊर्जा का संचार बना रहता है। यही कारण है कि मांगलिक कार्यक्रमो के साथ साथ तिलक धारण की प्रथा हमेसा से चली आ रही है।



३) जमीन पर बैठकर भोजन करना

जमीन में बैठकर भोजन करना एक तरह का योग होता है, जिससे पाचन क्रिया मजबूत रहती है और साथ ही दिमाग शांत रहता है।
इसी कारण जमीन में पल्थी मार कर बैठकर भोजन करना उत्तम माना गया है।



४) सिर पर शिखा(चोटी) रखने की प्रथा

सिर पर शिखा या चोटी रखने का प्रावधान हमारे समाज मे बहुत पहले से होता आ रहा है, इसका वैज्ञानिक प्रभाव वहुत अहम है। इसी स्थान पर मस्तिस्क की समस्त तन्तिकाये इकट्ठा होती है अतः शिखा रखने पर मस्तिष्क को शांत और एकाग्रचित्त रखने में मदत मिलती है।



५) व्रत या उपवास रखने की प्रथा

व्रत या उपवास रखना हमारी प्राचीन परम्परा है। यह पाचनतंत्र के लिए बहुत उत्तम होता है, कब्ज को खत्म करने में मदत मिलती है। साथ ही कई सोधो से पता चला है कि ये कैंसर जैसी बीमारियों से बचाव में मदत करता है। क्योंकि कैंसर की कोशिकाऐ अधिक समय तक भोजन न मिलने से खत्म हो जाती है।





Sunday, April 7, 2019

टीकाकरण के फायदे। Benefits of Vaccinations.

टीकाकरण क्या होता है What is Vaccination?

टीकाकरण या टीके के रूप में दी जाने वाली दवा जाने जाते हैं। टीका को अगर हम परिभाषित करे तो वो एक सुरक्षित रूप से और प्रभावी रूप से एक कमजोर या मारे गए वायरस या बैक्टीरिया या लैब-निर्मित प्रोटीन के बिट्स का उपयोग करते हैं जो उसी वायरस या बैक्टीरिया द्वारा संक्रमण को रोकने के लिए वायरस की नकल करते हैं। जब हम टीकाकरण को प्राप्त करते हैं, तो हमको एक बीमारी के कमजोर रूप (या टुकड़े) के साथ इंजेक्शन लगाया जाता है। यह आपके शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर करता है, जिससे यह या तो उस विशेष बीमारी के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन करता है या प्रतिरक्षा बढ़ाने वाली अन्य प्रक्रियाओं को प्रेरित करता है।



इसके बाद यदि हम कभी भी बीमारी पैदा करने वाले जीव के संपर्क में आते हैं, तो संक्रमण से लड़ने के लिए आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली तैयार होती है। एक टीका आमतौर पर किसी बीमारी की शुरुआत को रोकती है या फिर इसकी गंभीरता को कम करती है। इसी लिए हम यह कह सकते है कि टीकाकरण एक बहुत कारगर तरीका है बीमारी से बचाव में।

किसी को प्रतिरक्षित क्यों किया जाना चाहिए Why Need someone immunized ?


अच्छे स्वास्थ्य का लक्ष्य बीमारी को रोकना है। टीके का माध्यम किसी बीमारी को रोकने के लिए अन्य उपायों की तुलना में यह बहुत आसान और अधिक प्रभावी है। इसी लिए टीकाकरण करने का लक्ष्य होता है ताकि अधिक प्रभावी रूप से बीमारी को रोका जा सके।




टीकाकरण हमें गंभीर बीमारियों से बचाता है और उन बीमारियों को दूसरों तक फैलने से भी रोकता है। वर्षों से टीकाकरण ने कई संक्रामक रोगों जैसे खसरा, चेचक, और टीबी जैसी महामारी को खत्म किया है। साथ ही एक से दूसरे में फैलने वाली बीमारियों से मुक्ति मिली है जैसे चेचक और पोलिओ।

बच्चों को किन टीकाकरणों की आवश्यकता है Which Vaccination important for children ?


कई बीमारियों का प्रभाव अक्सर स्कूल या बचपन के दिनो अधिक होता है अतः अपने बच्चों को अपने टीकों के माध्यम से सुरक्षित करना महत्वपूर्ण है। ऐसा करने का लाभ यह है कि आपके बच्चे उन बीमारियों से सुरक्षित रहेंगे जो उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती हैं।
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 0-6 वर्ष के बच्चों के लिए अनुशंसित टीकाकरण में शामिल हैं:

१) हेपेटाइटिस बी
२) रोटावायरस
३) डिप्थीरिया, टेटनस, पर्टुसिस
४) हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी
५) न्यूमोकोकल
६) पोलियो वायरस
७) इंफ्लुएंजा
८) खसरा कण्ठमाला रूबेला
९) वैरिकाला (चिकनपॉक्स)
१०) हेपेटाइटिस ए

अपने बच्चों को टीकाकरण समय पर और सतर्कता से करवाना महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि आपका बच्चा एक निर्धारित खुराक से चूक जाता है, तो खतरा बढ़ जाता है और बाद में भी डॉक्टर की सलाह से टीकाकरण करवाया जा सकता है। स्वस्थकेंद्र या इनटरनेट में मौजूद शुची के अनुसार 0-18 वर्ष तक के बच्चों को टीकाकरण करवाया जा सकता है।


Thursday, April 4, 2019

लहसुन और शहद कई बीमारियों में होता है लाभदायक। Benefits of garlic's and Honey.

लहसुन एवं शहद के लाभ Benefits of Garlic and Honey:

लहसुन और शहद दोनो ही प्राकृतिक गुणों से भरपूर हैं। जहां लहसुन में कई प्रकार के औषधिय गुण होते हैं तो वहीं शहद में शरीर को जवां और ऊर्जा देने का काम करता है। बारिश के मौसम में लोगों को सर्दी-खांसी, जुकाम, गले में इंफेक्शन जैसी कई बीमारी घेरने का खतरा दुगुना बन जाता है। ऐसे में यदि हम कुछ बातों को ध्यान देंगे तो इन बीमारियों से आसानी से बचा जा सकता है। लगभग सभी घरों के किचन में लहसुन और शहद तो जरूर रहते हैं, लेकिन दादी-नानी के घरेलु उपचार के बारे में जानेंगे तो आप भी चौंक जाएंगे। लेकिन यदि दोनों को मिश्रण करके सेवन किया जाए तो आप कई बीमारियों से बच सकते हो। आज हम आपको बता रहे हैं लहसुन और शहद के मिश्रण का सेवन करने से आप किन किन रोगों से आप बच सकते हैं।




१) शरीर का अशुद्धिकरण में मदतगार

लहसुन और शहद का मिश्रण शरीर की गंदगी को अशुद्धिकरण या डीटॉक्स कर देता है। इससे शरीर की गंदगी बाहर निकल जाती है। दैनिक खानपान और कार्य से शरीर मे विषेले तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है जिसे शरीर से बाहर करना जरूरी होता है इस प्रक्रिया को अशुद्धिकरण कहते है।

२) सर्दी जुखाम दूर करने में कारगर


एक चम्मच शहद में लहसुन की 2- 4 कलियां पीस कर मिला लें, फिर इसे गुनगुने पानी में मिलाकर पीएं। ऐसा करने से आपका वजन कम तो होगा साथ ही सर्दी-जुकाम से राहत मिलेगी।

३) गले में इंफेक्शन

इंफेक्शन का गले में होना एक आम समस्या है। यह संक्रमण की वजह से होता है। शहद और लहसुन को एक साथ मिलाकर सेवन करने से गले की समस्याएं जैसे गले में सूजन, गले में खराश आदि दूर हो जाती है।

४) बजन घटाने और दिन की बीमारी को दूर रखता है

शहद और लहसुन को मिक्सर में पीस कर जूस बना लें, इसे पीने से कोलेस्ट्रॉल कम रहता है। जिसे पीने से दिल की बीमारी होने का खतरा कम बना रहता है।

५)  ऐसे मजबूत करें इम्यून तंत्र


शरीर में बीमारियों के लगने की मुख्य वजह है हमारे शरीर के इम्यून तंत्र का गड़बड़ रहना या कमजोर रहना। इम्यून सिस्टम को यदि आप मजबूत बनाए रखना चाहते हो तो आप नियमित लहसुन और शहद से बने मिश्रण का सेवन करें।



Monday, April 1, 2019

दिव्य औषधीय वृक्ष : आयुर्वेद के अनुसार। Divine medicinal trees : according to ayurveda.

दिव्य औषधीय वृक्ष Divine Medicinal Trees:
भगवान व्रह्मा ने जब सृजन किया तो शरीर के आहार के लिए खाद्य पदार्थ दिए तथा शरीर को रोगों से बचाने एवं अगर रोग हो जाय तो निवारण की लिए अनेक वनस्पतियों एवं वृक्ष बनाये। ऐसे कई दिव्य वृक्ष है जिनमे औषधीय गुण होते है और कई रोगों के उपचार में असरदायक होते है। आयुर्वेद इन्ही प्राकृतिक औषधि का उपयोग करता है और रोगों का निवारण करता है। आयुर्वेद इन सिद्धांतों का पालन करता है:

" सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्। "

वृक्ष हमे जरूरी ऑक्सीजन देते है साथ औषधी भी देते है, कुछ प्रमुख दिव्य औषधीय वृक्षों के गुण इसप्रकार है:



नीम का पेड़ Neem Tree

१) नीम का पेड़ Neem Tree:

नीम एक ऐसा पेड़ है जो सबसे ज्यादा कड़वा होता है परंतु अपने गुणों के कारण आयुर्वेद व चिकित्सा जगत में इसका अहम स्थान है। नीम रक्त साफ करता है। दाद, खाज, सफेद दाग और ब्लडप्रेशर में नीम की पत्ती लेना लाभदायक होता है।
नीम कीड़ों को मारता है। इसलिए इसकी पत्तों को कपड़ों व अनाज में रखा जाता है। नीम की 10 पत्ते रोज खाने से रक्तदोष खत्म हो जाता है।
नीम के पंचांग, जड़, छाल, टहनियां, फूल पत्ते और निंबोली बेहद उपयोगी हैं। इसलिए पुराणों में इसे अमृत के समान माना गया है। नीम आंख, कान, गला और चेहरे के लिए उपयोगी है। आंखों में मोतियाबिंद और रतौंधी हो जाने पर नीम के तेल को सलाई से आंखों में डालने से काफी लाभ होता है।




बबूल का पेड़ Babool Tree

२) बबूल का पेड़ Babul Tree:

बबूल का गोद औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा अनेक रोगों के उपचार में काम आता है बबूल की हरी पतली टहनियां दातून के काम आती हैं।बबूल का गोद उतम कोटि का होता है जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा सेकडो रोगों के उपचार में काम आता है ।बबूल की दातुन दांतों को स्वच्छ और स्वस्थ रखती है।



पीपल का वृक्ष Peepal Tree

३) पीपल का वृक्ष Peepal Tree:
पीपल का वृक्ष का धार्मिक महत्व बहुत अधिक होता है, गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि वृक्ष रूप में मैं स्वम पीपल हूँ। स्वास्थ्य के लिए पीपल को अति उपयोगी माना गया है।पीलिया, रतौंधी, मलेरिया, खाँसी और दमा तथा सर्दी और सर दर्द में पीपल की टहनी, लकड़ी, पत्तियों, कोपलों और सीकों का प्रयोग का उल्लेख मिलता है।



बरगद का वृक्ष Banyan Tree

४) बरगद का वृक्ष Banyan Tree:
हिंदू धर्म में वट वृक्ष की बहुत महत्ता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति की तरह ही वट,पीपल व नीम को माना जाता है, अतः बरगद को ब्रह्मा समान माना जाता है। अनेक व्रत व त्यौहारों में वटवृक्ष की पूजा की जाती है।यह आस्था के ऊपर निर्भर करता है। यह रात और दिन हरसमय ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है।



अर्जुन का वृक्ष Arjuna Tree 

५) अर्जुन का वृक्ष Arjuna Tree :
अर्जुन की छाल में अनेक प्रकार के रासायनिक तत्व पाये जाते हैं। कैल्शियम-सोडियम की प्रचुरता के कारण यह हृदय की मांसपेशियों के लिए अधिक लाभकारी होता है। अर्जुन शीतल, हृदय के लिए हितकारी, स्वाद में कसैला, घाव, क्षय, विष, रक्तविकार, मोटापा, कफ तथा पित्त को नष्ट करता है। अर्जुन के पेड़ की छाल को हृदय रोगों के लिए अमृत माना जाता है। इससे हृदय की मांसपेशियों को बल मिलता है। जिससे हृदय की धड़कन ठीक होकर सामान्य होती है। इसके उपयोग से सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकुचन होता है, जिससे रक्त, भार बढ़ता है।